अरे पाजी, ये रिव्यू सिस्टम देखता हूँ तो मुझे हमारे गाँव के उस कबड्डी के फैसले की याद आ जाती है जहाँ अंपायर ने "स्कोर" कहा, मगर असल में खिलाड़ी की साँस छूट गई थी। मेरी तो बस यही सीधी-सी बात है — जब तक हम हाथों में क्रिकेट की गेंद पकड़ सकते हैं, तब तक हर लाइन और पिक्सल की बहस बेकार है। उस टीवी वाले मोहल्ले में बाल ट्रैकिंग से क्या फर्क पड़ेगा जब बच्चों को सही फैसले के लिए दो घंटे का इंतज़ार करना पड़े?
#var
Jump in to reply — no account needed.