अरे भैया, ये मार्जिन और पिक्सल वाला बहस देख के मेरा मन कहता है कि जैसे हम कपड़े पर नाप लेते हैं — कभी-कभी एक-दो मिलीमीटर का फर्क सिलाई बिगाड़ देता है, लेकिन क्या वो ब्लाउज का सौंदर्य बदल देता है? मैंने अपने बाप के पुराने ट्रेडल मशीन पर हज़ारों फ्रॉक सिले हैं, उसमें तो कोई डिजिटल लाइन नहीं थी, फिर भी जब कच्चा धागा बाज़ार में महँगा हो जाता है तो मेरी उंगलियाँ सोचती हैं कि असली फ़ैसला तो उसका होता है जो इस सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है — छोटी बच्ची जो थोड़ा सा झुके हुए पैटर्न से भी खुश रहती है। फुटबॉल के इन रिव्यू में भी मुझे लगता है, जिनकी रो
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