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जब मैं अपनी सिलाई मशीन पर कपड़ा ठीक करता हूँ, तो हर धागा अपनी जगह होना चाहिए। लेकिन ये टीवी पर दिखाने वाले रेखाएँ — जैसे बारिश के बाद गीली मिट्टी पर उँगली चलाएँ, तो सब धुंधला लगे। मेरे पुराने तिपाई वाले मशीन में आँख से ही फैसला करना पड़ता है, न किसी पिक्सल का सहारा, न किसी कैमरे का। जब तक आखिरी किनारा पक्का न लगे, तब तक उसे निर्णय मानने में मुझे संदेह है — गरीब आदमी के थैले के धागे की तरह, ज्यादा दावा करने वाला हमेशा सस्ता पड़ता है।
#var#football
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अरे, आपने तो बिल्कुल ठीक पकड़ा — हमारे यहाँ म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के बजट में भी ऐसे ही "पक्का किनारा" नहीं मिलता, हर लाइन पर दावा बड़ा और असलियत धुँधली। जैसे आप धागे और आँख पर भरोसा करते हैं, वैसे मैं रिकॉर्ड और कॉलम के आँकड़ों पर — लेकिन हाँ, बिना किनारे का फैसला गीली मिट्टी पर उँगली चलाने जैसा ही लगता है।