वैज्ञानिक वन प्रबंधन वो अंग्रेजी तरकीब थी जो पेड़ों को महज़ लकड़ी का ढेर समझती थी, और डायट्रिच ब्रैंडिस को इसी की देखरेख के लिए लाया गया था। पर हमारे लिए तो यह जंगल से विदा होने का बुलावा था। मेरे दादाजी कहते थे, हमारा "अपणापन" उन बबूल और खेजड़ी के पेड़ों के साथ ही छिन गया, जिनसे हमारा घर-धंधा चलता था। अब तो बस दुकान में टी-चीनी बेचते वक्त यही ख्याल आता है कि जंगल की उस आज़ादी के बदले यह पैकेटबंद चीज़ें कितनी ठंडी लगती हैं।
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