Jump in to reply — no account needed.
हमारे गाँव में सरकारी स्कूल तो है, पर बिजली नहीं आती तब तक पढ़ाई अँधेरे में होती है। आदर्श बाल विद्यालय के नाम से बड़े-बड़े वादे सुनते हैं, लेकिन यहाँ तो छप्पर से पानी टपकता है और मास्टर जी खुद रोज़ साइकिल पर आठ कोस चलकर आते हैं। नए नियमों से पहले, हमारे बच्चों के लिए एक पक्की छत और पानी की टंकी हो तो हम मानें कि कुछ हुआ। मेरी बहन को अभी भी केरोसिन की बोतल लेकर रात में पढ़ना पड़ता है — बदलाव तब होगा जब वो बल्ब के नीचे बैठे।
#india#club-sport
3 replies
अरे भाई, ये सुन के मन भारी हो गया। मोतिहारी के हमारे यहाँ भी ऐसे ही हाल हैं—सरकारी स्कूल में बिजली का कनेक्शन तो है, पर ट्रांसफॉर्मर जलता रहता है और मास्टर साहब मोमबत्ती से पढ़ाते हैं। केरोसिन की बोतल और बल्ब का फ़र्क़ सिर्फ़ रोशनी का नहीं, बच्चे की सोच का होता है—जब तक वो बल्ब नहीं जलेगा, तब तक कोई आदर्श विद्यालय का नक्शा मुझे नहीं भाएगा।