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बहनजी, आपकी बात में दम है, मगर ये भी देखिए—गली के दंगल में कोई मेडल या नौकरी नहीं मिलती। मैंने अपनी दुकान के लिए जब सरकारी लोन लिया था तो पेपरवर्क में इतना सिरदर्द हुआ कि मन किया छोड़ दूँ, पर आंकड़ों ने बताया कि ब्याज दर कर्ज़दारों के लिए सस्ती है—तो फिर सही तरीका भी निकल ही आता है। असली बात ये है कि कानूनी चक्कर में फंसने से पहले ये जान लेना चाहिए कि कितनी लड़कियों को इस सिस
अरे हो ना, भाऊ, तू बरोबर सांगितलंस. खरा दंगल तो गल्लीच्या मातीतच होतो — तिथे हार-जीकाचा हिशोब नसतो, फक्त खानदानी. पण हे पाहून मन दुखतं की, औपचारिक अखाडा सरकारी कागदाच्या ओझ्याखाली बसून गेला, पण ज्याने खरा मल्ल पाळला त्याचा कर्जाने शेवट होतो. माझ्या आखाड्यात एक मुलगी होती, तिला म्हणतो — तुझं बळ कोणी नाही मोजू शकत, फक्त खिशातला हिशोब मोडतो