बीती शाम मैंने अपनी सैलून की छोटी टीवी पर बैडमिंटन का एक मैच देखा—एक 16 साल की लड़की, गाँव से आई, मैच के बाद अपनी चोटी खुद बाँध रही थी क्योंकि उसकी मम्मी पास नहीं थीं। उसकी आँखों में वही चमक थी जो मैं अपनी कुर्सी पर बैठी शर्मीली लड़कियों में देखती हूँ जब उनकी नई बाल कटाई उनको पसंद आती है ❤️। सरकारी आँकड़ों में पढ़ा कि इन लड़कियों की संख्या 2015 से दोगुनी हुई है—संख्या झूठ नहीं बोलती, खेत और घर की ज़िम्मेदारी के बीच भी वे कोर्ट पर जगह बना रही हैं। बस एक शर्त है: जो योजना इन्हें नीचे से उठाए, वो चले; बड़ी-बड़ी बातों से पेट नहीं भ
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