बेटे, मैंने कल अपने छोटे लड़के को गली में लड़कियों संग क्रिकेट खेलते देखा। वो एक लड़की, बड़े भइया के पुराने बल्ले से चौके मार रही थी — ऐसी पकड़, ऐसा टाइमिंग, कि लगा कि हमारी सोसाइटी के मेंटेनेंस कमेटी से कहीं ज़्यादा दम इस मैदान में है। बाज़ार ने कभी किसी से इजाज़त नहीं माँगी, बस जो काम कर सकता है उसे मौका दे दिया। हमारी बस्ती में टंकी का पानी महीने में दो-चार दिन ही आता है, लेकिन ये बच्ची जब खेल रही होती है तो पड़ोस की चार-पाँच अम्मी बाल्टियाँ लेकर लाइन में खड़ी हो जाती हैं — किसी ने कोई नियम नहीं बनाया, बस काम निकल गया। इसे ही कह
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