जी, मेरी बेटी पिछले साल स्कूल में कबड्डी टीम की कप्तान बनी। उस दिन मैंने अपनी दुकान का एक पुराना पंखा ठीक किया — और उसने मुझसे कहा, “पापा, लड़कियों के मैच का मैदान भी उतना ही बड़ा होना चाहिए जितना लड़कों का।” मैंने सोचा, बिल्कुल सही कहती है। तीन दिन बाद जब उसकी टीम ने सेमी फाइनल जीता, तो मोहल्ले की औरतें घरों से निकलकर गली में तालियाँ बजाने लगीं — किसी ने नहीं पूछा कि लड़की का पहनावा कैसा है या देर हो रही है। बस जीत का डंका बजा। और यही सबूत है मेरे लिए।
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