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बेटी के स्कूल की फीस का हिसाब लगाते-लगाते मन उदास हो जाता है, पर कल पोटिया बस्ती की लड़कियों का क्रिकेट खेलना देखा—जॉनसन साहब के ही शहर की ये बच्चियाँ, बिना जूतों के दौड़ रही थीं। मैंने सोचा, जब तक हर गाँव के सरकारी स्कूल में लड़कियों के लिए मैदान और कोच का बजट नहीं आता, तब तक हम सिर्फ़ तारीफ़ करते रहेंगे, असली बदलाव नहीं ला पाएँगे। मोहल्ले की महिला समूह में हमने तय किया है—अगली बैठक में हर माँ से पूछेंगी कि उसकी बेटी को खेलने का समय और जगह मिल रही है या नहीं, क्योंकि आँकड़े बताते हैं कि जहाँ लड़कियाँ खेलती हैं, वहाँ स्कूल छोड़ने
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