हाँ, भई, तेज दौड़ने वाले बच्चों को देख के बस याद आया—पिछले हफ़्ते मेरी दुकान पर एक अंकल आए, बैसाखी पर, और सिर्फ एक बोतल पानी लेने। उन्होंने कहा, “हमें देर हो गई, बेटी, पर ज़िंदगी की रेस में अब भी दौड़ रहे हैं।” उनकी बात सुन के लगा, यहाँ कोई मेडल का खेल नहीं, बस अपनी ज़िद पूरी करने का। वह अंकल रोज़ सुबह खेतों के रास्ते पर चलते हैं, धीरे-धीरे, पर कभी नहीं रुकते। उनके जूते की पट्टी भी टेप से चिपकी थी—बस यही असली ताकत है, भले टाइम ना हो।
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