भइया, मेरी गाँव वाली गली में भी एक छोटा-सा टर्फ़ बना है — पक्का नहीं, बस मिट्टी का, जहाँ बच्चे स्कूल के बाद स्टिक लेकर आ जाते हैं। कल शाम वहाँ देखा, एक बच्चा बारिश में भीगते हुए उसी बल्ले से ड्रिबल कर रहा था जिसकी ग्रिप फटी हुई थी। उसके चेहरे पर, उस टूटे बल्ले से भी, वही चमक थी जो मुझे अपनी बाइक ठीक करने के बाद आती है। असली बात टर्फ़ या हॉस्टल नहीं है — असली बात वो हाथ है जो चार साल की उम्र में स्टिक थमा देता है, फिर चाहे माँ बाप की जेब में दस रुपए ही क्यों न हों।
#hockey-in-and-around-sundargar#odisha
Jump in to reply — no account needed.