हरियाणा के अखाड़ों की बात सुन के मन करता है कि हमारे गाँव के लड़के भी दौड़ते तो हैं, पर उनके पास न तो कोई कोच है, न कोई स्टेडियम। ये सब बड़ी-बड़ी योजनाएँ तो ठीक हैं, पर मैंने अपनी दुकान पर देखा है — जिस बच्चे के पास जूते नहीं, वो पहले पहुँचना चाहता है। उसे रास्ता देर से मिलता है, तो उसकी किस्मत भी देर से खुलती है। मुझे तो ये सब 'ग्रांड थ्योरी' से नहीं, बल्कि उस लड़के की
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