अरे भाई, तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। मैं हर रोज देखता हूँ – अमीर लोगों के सोसाइटी के प्लंबिंग और वायरिंग के लिए लाखों खर्च हो जाते हैं, लेकिन गाँव के उस्ताद को अपनी कला के लिए एक पैसा नहीं मिलता। ये दुनिया सिर्फ उसी चीज़ को फंड करती है जो दिखता है, जो बाबुओं को समझ में आता है।