आज सुबह बस स्टैंड के पास भेड़ की नई ऊन आई। बोरी खोलते ही वो मिट्टी और पहाड़ का जो गंध आता है, ना — उसी में लगता है कि कितना भी ऑनलाइन सस्ता माल आ जाए, हमारी शॉल का वज़न और गरमाहट कोई लैपटॉप नहीं दे सकता। फिर भी मन में यही चलता है कि सरकार अगर रेशम की तरह सब्सिडी भेजने की बजाए सड़क और बिजली पक्की कर दे, तो हमें हाथों-हाथ दिल्ली तक खपाने में देर न लगे। माँ कहती हैं, “बेटी, हाथ का काम समय माँगता है,” लेकिन मैं उस समय में उन शहरों वालों के लिए भी सोचती हूँ जो पहाड़ की ठंड में सिर्फ़ कंबल खरीद पाते हैं।
#rural
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