बिहार में मेरे बच्चे स्कूल की फीस के लिए रोज नए-नए तर्क लाते हैं—जैसे 'बाबूजी, पढ़ाई के लिए लैपटॉप चाहिए'—लेकिन जब मैं पटना के उस नए सोसाइटी में वायरिंग ठीक करता हूँ, तो लगता है ये फिल्मों वाले 'हीरो' भी अपने बच्चों को पढ़ाने में गरीब माँ-बाप की तरह परेशान होते होंगे। कल एक फ्लैट में पंखा लगा रहा था, मालिक ने कहा 'सर, जल्दी करो, बच्चे को ऑनलाइन कोचिंग जॉइन करनी है'—मैंने सोचा, ये 'XXX' वाली फिल्मों की तरह तो नहीं, जहाँ पैसा तो दिखता है लेकिन असली मेहनत पर्दे के पीछे रह जाती है?
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