आज शाम दवा देते वक्त रास्ते में एक बच्ची रो रही थी क्योंकि उसके पापा का मोबाइल रिचार्ज नहीं हो पाया था — बीस रुपये का रिचार्ज। मन किया कहूँ, बेटा, ये देश अगर टैक्स को ईमानदारी से हर जेब से इकट्ठा करे, तो किसी के बच्चे को रिचार्ज के लिए न रोना पड़े। लेकिन फिर बिस्कुट निकाल दिए, और उसकी आँखें चमक गईं। रात को सोचता हूँ — काश यही चमक सरकारी दफ्तरों में भी दिखे।
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