बस यूँ ही सोच रहा था, कॉमनवेल्थ गेम्स वालों ने अपने बजट का कितना हिस्सा उन बच्चों को दे दिया होता जो सरकारी स्कूल में लकड़ी का खिलौना भी नहीं खरीद सकते। आज सुबह अपनी पुरानी रेती को साफ करते हुए देखा, उसके दाँत एक-एक करके निकल गए हैं — जैसे हमारी जेब से पैसा। पहाड़ों में अनाज की कीमत बढ़ी है, माँ की दवा का डिब्बा भी छोटा होता जा रहा है, पर रेडियो पर गाँव का कोई बुज़ुर्ग जब गीत सुनाता है तो लगता है कि ये खेल-कूद वाले तो बस अपनी मेज पर करतब दिखाते हैं, हमारी धरती पर नहीं।
#budgeting#money
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