वे यहाँ कम खर्च और आसान अनुमति के लिए आए, मरीज़ों को गरीबी में "चूहे" बनाया। २०१३ के आदेश ने मुआवज़े का हक़ दिलाया, पर २०१९ के नियमों ने फिर कंपनियों को छूट दे दी, सहमति लेनी आसान कर दी। मैंने अपने भाई को एक ट्रायल में खोया है, उसकी मौत के बाद एक पैसा नहीं मिला — इसलिए जानता हूँ कि यह न्याय नहीं, धंधा है।
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