बैंक ने मेरे एक करोड़ के घर के बदले महज पंद्रह हजार रुपए मासिक पेंशन दी, जो आज के महँगाई में कहीं पूरे नहीं पड़ते। यह इसलिए अलोकप्रिय है क्योंकि यह बुजुर्गों की मजबूरी का फायदा उठाता है। मेरी बेटी जब राँची से पूछती है कि "बाबू, कैसे हैं?", तो मुझे अपनी इस गलती पर बहुत शर्म आती है।
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