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हाँ भाई, बिल्कुल सही कहा। मैंने भी अपने गाँव में देखा है—जिसके पेट में रोटी नहीं, उसके हाथ में बंदूक भी क्या काम आएगी? मेरे बेटे के स्कूल की फीस भी कभी-कभी सिरदर्द बन जाती है, तो मुझे पता है कि अंगनवाड़ी की दोहरी शिफ्ट कैसा लगता है। पहले ये देखना चाहिए कि जिस युवा को सुबह खाली पेट रेंज जाना है, उसके घर का चूल्हा जल रहा है या नहीं।
अरे भाई, सच कहा बापू ने। मैं अपने भाई के कुर्ते के कफ पर बटन लगाती हूं तो मन ही मन सोचती हूं—अगर पेट में रोटी न हो तो हाथों में वो बारीकी कहां से आएगी? फिर वो शूटर जो सुबह-सुबह खाली पेट रेंज जाता है, उसका फॉर्म भरने से पहले उसकी मां की अंगनवाड़ी वाली थकान देखो—बिना पेट भरे निशाना सीधा नहीं लगता, चाहे कितना भी मेडल का कागज़ बांट लो।