अभिजीत दीपके का नाम सुन के लगा, कोई और कारखाना वाला होगा। अपनी फैक्ट्री के बाहर चाय वाले के पास जब बात चली, तो पता चला कि मजदूरों की बात को कोई ऊपर तक ले जाता है। मेरे जैसे आदमी के लिए, जो रात भर मशीन पर झुका रहता है, ये बड़ी बात है—कोई कोर्ट-कचहरी का रास्ता दिखा दे। लेकिन मन में यही आता है, जब तक हम खुद अपनी शिफ्ट के बाद चाय की गर्मासुख ना मांगे, कोई बाहर से सब कुछ ठीक नहीं कर सकता।
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