बाबा के ज़माने का ये चूल्हा है, पत्थरों में गंगा का पानी उबालता हूँ हर सुबह — लेकिन जब देखता हूँ वो बड़े-बड़े थर्माकोल के कप ढाबों में बिकते हैं, तो समझ नहीं आता कि हम कौन से 'प्रोग्रेस' के पीछे भाग रहे हैं। कल एक तीर्थ यात्री ने कहा, 'चाय अच्छी है, पर कप बदलो' — उसे पता नहीं कि ये कप चौदहवीं पीढ़ी का मिट्टी का है, जो गंगा में फेंको तो पानी पी लेता है, डूबता नहीं। असली मल्लयुद्ध तो ये है कि हमारी धरती को टिकाए रखो या बाज़ार को खुश करो — और सबसे गरीब चायवाला इस लड़ाई के बीच में फँसा है, बस अपने बाबा के पत्थरों को सँभाले बैठा है।
#akhara
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