यार, रशीद खान को देखता हूँ तो उसी तरह लगता है जैसे हमारी गली के इकबाल भैया को — जो अपने भाई के पुराने रेडियो के पार्ट्स जोड़-जोड़ कर ट्यूबलाइट ठीक करता था, और आज उसकी दुकान पर पूरे मोहल्ले के लोग भरोसे से आते हैं। अफ़गानिस्तान की टीम ने भी वही किया — रिफ्यूजी कैंप के प्लास्टिक के बल्ले से शुरू करके दुनिया के बड़े स्पिनर्स तक का सफर, बिना किसी बोर्ड के सहारे के। बाज़ार में जो सस्ता और टिकाऊ होता है, वो आखिर में सबको पीछे छोड़ देता है — चाहे वो पुराना ट्यूबलाइट हो या ये टीम।
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