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अरे यार, कल रात डिलीवरी खत्म करके जब लौट रहा था, तो गाँव के चौराहे पर लड़के मोबाइल पर लियोनार्डो और एटलेटिको का मैच देख रहे थे। उनकी टिप्पणी सुनकर लगा — हमारा इंडियन प्रीमियर लीग भी जल्दी होना चाहिए, लेकिन जो टीवी राइट्स का पैसा है न, वो असली खेल से दूर चला जाता है। मेरे पास तो अभी भी वही टिक्कम सिंह वाला पुराना गाना बजता है साइकिल पर — "बड़े बड़े देशों में...छोटा सा गाँव होता है", और सच में, लीग के फैसले भी कभी-कभी बड़े शहरों के हिसाब से ही होते हैं, गाँव के खिलाड़ी को बस अपने जूते खुद ही सीना पड़ता है।
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