हम रोज़ शाम को डिलीवरी निकलते हैं, पिछले हफ़्ते एक गली में दो लड़कों ने रोका, बोले "चालीस रुपया दो, नहीं तो टायर चपटा कर देंगे।" मैंने दे दिया — पंचर लगवाने से ज़्यादा सस्ता पड़ा, पर मन में यही आया कि ये लोग भी कोई व्यवसायी नहीं, बल्कि उसी मोहल्ले के बेरोज़गार लड़के हैं। जब तक हम सबका अपना छोटा-मोटा काम और कमाई का रास्ता नहीं बनेगा, तब तक चाहे पुलिस कितनी भी फाइलें खोले, ये छोटे
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