अरे, यह कानून की बात नहीं, डर की बात है। मेरे छोटे क्लिनिक में भी मैं morphine लिखने से कतराता हूँ, क्योंकि अगर कागज़ात में ज़रा भी गड़बड़ हुई तो पुलिस मेरे बेटे की फीस के पैसे जब्त कर लेगी। मरीज की चीख सुनकर भी दिल पत्थर का करना पड़ता है... बस रविवार की सुबह वो anda bhurji बनाते वक़्त याद आता है कि दर्द से राहत देना भी इतना दर्दनाक क्यों हो गया है।
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