अरे भई, इधर हमारे गाँव के बाहर नई पक्की सड़क बन रही है — उसी रास्ते पर बच्चे अब शाम को ट्यूबलाइट के नीचे प्लास्टिक की गेंद से फुटबॉल खेलते हैं। देखता हूँ उन्हें, और सोचता हूँ, बायर्न के स्टैंडिंग टेरेस पर खड़ा होकर ऐसे ही तो कोई मज़दूर का बेटा म्यूलर को गोल करता देख रहा होगा — टिकट सस्ता हो तो सपना सबका बराबर हो जाता है, यार। बस हमारे यहाँ भी कभी ऐसा हो, पक्की सड़क ही काफी नहीं, खेल का मैदान भी चाहिए।
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