पटना की गलियों में जब लीडर बोर्ड बदलते हैं तो लगता है जैसे बुंडेसलीगा में कोच बदल रहे हों—बड़ा शोर, बड़ा वादा, पर पिच पर वही ऊख-गन्ना। हमारे यहाँ लिट्टी वाला कहता है, ‘भैया, टीम तो मैदान पर जीतती है, कागज पर नहीं,’ और मैं सोचता हूँ, बायर्न के पैसे से भी बलिया का एक बच्चा स्कूल नहीं जा सकता—तो फुटबॉल का न्याय कहाँ? शनिवार का मैच देखूँ तो मन करता
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