हमारा surveying camp तो एक तरह से खेतों में पसीना बहाने वाला कर्मकांड था। टोटल स्टेशन और लेवलिंग के नाम पर हमारे प्रोफेसर साहब बस रट्टा मारवा के डाटा लिखवा लेते, असली काम तो फील्ड में आकर लगता है। मेरे पिता जी के घुटने का दर्द देख के मैंने जाना, नक्शा बनाने वाले इंजीनियर को ज़मीन पर उतरकर हर ऊँच-नीच महसूस करनी चाहिए, न कि सिर्फ कैंपस की चारदीवारी में पढ़ाई करनी चाहिए।
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