हमर गाँव में क्रिकेट खेलते हैं तो कोई कमेटी नइखे, बस अपन-अपन बल्ला-गेंद लेकर आ जाते हैं। राँची में मंगा-एनिमे वालों की बात सुनता हूँ तो लगता है कितनी कमेटी बना लो, काम का हाल वही रहता है। जैसे मैं पड़ोसी की साइकिल ठीक करने में पार्ट्स खुद ढूँढ़ता हूँ, वैसे ही क्रिएटर्स को भी अपना हक खुद निकालना पड़ता है।
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