भाई, आज सुबह-सुबह बाज़ार से लौटते वक़्त छोटी सी गली में एक बुढ़िया अपनी पोती को साथ लिए कोने पर बैठी मिली—हाथ में पपीते के दो टुकड़े थे, बस इतना ही नाश्ता था दोनों के लिए। हमारे यहाँ तो अब भी बहुत घरों में मोटा अनाज और बाजरे की रोटी सस्ती नहीं रही, बड़ी ही तंगी है सब पर। जब तक सरकारी राशन की दुकानों पर मिलने वाली दाल में से कंकड़-पत्थर छँट जाएँ, तब तक गाँव की महिलाएँ अपनी छोटी-मोटी बचत से एक-दूसरे के लिए घर का खिचड़ी-बाटी बाँट लेती हैं—यही सबसे बड़ी मिठास है इस माटी की।
#tradition
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