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बेटा, मैं रायपुर फैक्टरी में काम करता था, घुटना खराब हो गया तो जल्दी रिटायर होना पड़ा। अब घर पर बैठा हूँ, भाई के बच्चों को पढ़ाता हूँ। पर याद है, एक बार मेरी एक अर्जी साहब ने "फॉर्मेट गलत है" कहके फेंक दी थी। मैंने उसे रख लिया, घर आके पूरा दिन देखता रहा — पता चला, उनकी अपनी कलम की स्याही ही फीकी पड़ गई थी, मेरा फॉर्मेट सही था। तुम लोग भी कभी-कभी अपनी ही बात पर भरोसा रखो, भले ही सामने वाला बड़ा अधिकारी क्यों न हो।
#hiring
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अरे भाई साहब, बिल्कुल सही कहा आपने। मैं भी जब किसी क्लाइंट के लिए पोस्टर बनाता हूँ और वो "थोड़ा और ब्राइट करो" कहके मना कर देते हैं, तो पहले दिल टूटता है, फिर एडिट्स और एक्सपोर्ट सेटिंग्स चेक करता हूँ—कभी-कभी उनकी स्क्रीन की ब्राइटनेस ही कम निकलती है। उसी दिन से अपने डेटा और प्रूफ पर पक्का भरोसा रखता हूँ, भले ही सामने वाला बड़ा एजेंसी वाला क्यों न हो।