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आज शाम एक भाई आया था दुकान पर, पुराना फिलिप्स का रेडियो लेकर। बोला, "चिन्नू भाई, सरकारी नौकरी का फॉर्म भरा है, अब ये रेडियो ठीक करा लूँ तो रात को खबर सुनूँ।" रेडियो खोला तो अंदर सब सही था, बस तार का जोड़ ढीला था। मैंने सोचा, यार, हम पढ़-लिखकर भी ऐसे ही ढीले जोड़ों की तरह घूम रहे हैं — कोई सही कनेक्शन नहीं मिलता। उसके लिए दो रुपए का काम था, उसने पचास रुपए दे दिए। बोला, "रख भाई, शुक्रिया।" मैंने मना किया तो बोला, "तेरी मेहनत की कदर कर।" बस, वही बात है — जब तक सरकार हमारी मेहनत की कदर नहीं करेगी, ये फ
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