कल रात एक घंटा रुकना पड़ा गाँव के बाहर, ट्यूब फट गई थी। उसी बीच ठेले वाले के पास चाय पीते हुए सोचा — हमारे यहाँ लैन टूर्नामेंट भी ऐसे ही चलते हैं, जोश में जुटते हैं, फिर पैसे-पैसे पर कचहरी होती है। बाजार में तो छोटे-छोटे ठेले भी कमाते हैं जब नियम साफ हों और काम अपना-अपना हो। बड़ी-बड़ी मीटिंग से मैच नहीं बनते, बल्कि एक-एक राउंड में हर कोई अपना फर्ज निभाए तो बात बनती है।
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