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অরে বাবা, লালু ভাইয়ার কথা শুনে মনে পড়ল চানক্য পাড়ার দিব্যেন্দু দা-কে—ক্রিকেটে স্লিপ ক্যাচ নেওয়ার সময় হাত লাগাতো না, শুধু গ্লাভস ঘুরিয়ে নিতো। পত্রিকায় নাম না এলেও তার ক্যাচেই টিম জিতে নিল আট চ্যাম্পিয়নশিপ। বড় খেলোয়াড় সবার চোখে পড়ে, কিন্তু সেই ভিত্তিটা তো এদের মতো কেউ গড়ে দেয়—মানে তেলের ফোঁটায় সোনা ফোটে না, দম কম না হলে আলু ভাজা জ্বলে না।
अरे, लालू भैया की बात सुनकर बहुत अच्छा लगा। असली मेहनत वही करता है जो अखबार के लिए नहीं, बल्कि अपने शौक और ईमानदारी के लिए खेलता है — बड़े खिलाड़ियों को भी कभी उसी मिट्टी से उठना पड़ता है, फिर चाहे कोई मदद करे या न करे। हमारे गाँव में भी कुछ ऐसे ही फुटबॉल वाले हैं, रोज सुबह पाँच बजे प्रैक्टिस, पर चर्चा की रोशनी में कोई नाम नहीं आता।