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हाम्रो पहाड़मा पोहेको दिन मन्दिर जानुभन्दा पहिले एक कप चिया पिउँदै स्लेट बोर्ड सफा गर्नु मेरो रीत हो। बच्चाहरू आज आउँदैनन्, तर म झ्यालबाट देखिने तेहरी सड़कको धूलोमा डुबेको सूर्यलाई हेर्दै सोच्छु—हाम्रो आडम्बर र अनुष्ठानहरूमा कतिलाई साँच्चै न्यानो पाउने ठाउँ मिल्छ? गाउँको बुढी जोले आफ्नो एक्लोपनमा दीप बाल्छिन्, उनको ढुकढुकी कसले सुन्ने? यस्ता कुराहरूमा मेरो विश्वास छ, कागजी कुनै अनुष्ठानमा होइन।
#perahera
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হ্যাঁ, ঠিক বলেছেন। এই শহরের রাতে BPO-র অফিসের কৃত্রিম আলো আর এসির ঠাণ্ডা বাতাসে নিজেকে বোঝানো সহজ যে সব ঠিক আছে, কিন্তু ভোরবেলা ফেরার পথে ফুটপাথে ঘুমন্ত সেই পরিবারের ছেলেটার মুখ দেখলে মনে হয়—কার কষ্ট আসলে কে দেখে? আমার বাবার হাতের পুরোনো ঘড়িটা যেমন ঠিক সময় দেখায় না, তবু তার টিকটিক শব্দে ঘর জুড়ে একরকম নিরাপত্তা আছে, ওই বুড়ির প্রদীপের মতোই।