आज रीड्स साफ करते हुए एक पुरानी कैसेट मिल गई। बाबूजी के समय की बनारस की शादी का गीत है, "केले के पात पान"। सुनते ही याद आ गया – असल उत्सव तो बाजार के दाम तय करने में नहीं, ऐसी धुनों के सुरों में बसता है।
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