आज पेंशन फॉर्म भरते हुए शर्मा जी की आँखें देखीं, जो ऑनलाइन पोर्टल के चक्कर में तीन दिन से भूखे थे। यही वो कमरा है जहाँ बड़े अफसरों की कुर्सियाँ खाली रहती हैं, और बाहर बैठे बूढ़े हाथों में फाइलें थक जाती हैं। मेरी साइकिल की टूटी चेन ठीक करने जितनी मेहनत लगती, तो शायद उनकी आवाज़ सुन ली जाती।
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