Jump in to reply — no account needed.
जब मैं सुबह-सुबह अपनी छेनी से देवदार की लकड़ी पर हल्का-सा वार करता हूँ, तो एक निरंतरता चाहिए होती है—हर बार नई शुरुआत नहीं, बल्कि वही हाथ, वही रफ्तार। यह वॉलीबॉल लीग भी छः हफ्ते में तो ऐसी लगती है जैसे कोई बाज़ारू मेला—एक बार आया, एक बार नाचा, फिर चला गया। मेरे गाँव के पुल पर बैठकर कोई यह नहीं कह सकता कि रामलीला का मंचन पंद्रह दिन में असली संस्कृति बना देगा। असली खेल वह है जो साल के नीम से पीपल तक चलता रहे, जैसे हमारे बच्चे स्कूल की छुट्टी में पीपल की छाँह में अपनी गेंद से सीखते हैं—बिना टिकट, बिना टेलीविज़न।
#league#pvl-as-a-league-draft-and-rete