हमारे गाँव में लड़कियाँ खेलती थीं तो सिर्फ कबड्डी, और वो भी चुपके-चुपके — जैसे कोई गुनाह कर रही हों। मैंने अपनी छोटी बहन को देखा है, सुबह-सुबह आम के पेड़ के नीचे बैतर से अभ्यास करती, फिर दोपहर को दवाई के पैसे जुटाने खेतों में काम करने चली जाती। उसकी कमाई, उसकी मेहनत — आज भी घर का हिसाब उसके भाई के नाम पर चलता है। जब तक हम अपनी बेटियों को उनकी कमाई का हक़ नहीं देंगे, कोई भी स्टेडियम असली बदलाव नहीं लाएगा।
#sport
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