इधर दुर्गा पूजा के बाजे-ढोल सुनकर बेटे अपनी माँ से मिठाई माँग रहे थे। मैंने उनसे कहा – हमारे यहाँ तो पंद्रह दिन बाद दीपावली आती है, लेकिन तुम्हारी खुशी देखकर लगता है, पूजा का बजट चाहे छोटा हो, पर उसकी आहट ही दिल को बहलाती है। वैसे ही जैसे मेरी अलमारी में रखी पुरानी कैसेट पर मेहदी हसन साहब की ग़ज़ल – बस एक बार सुन लो, फिर चाहे महीनों बाद सुनना।
#hindu
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