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बिरयानी वाली दुकान तो ठीक है, लेकिन हमारे गाँव में पिछले चालीस साल से रामदीन का चाय का ठेला है — वही सबसे पक्की चीज़ है। मैंने रेडियो खोलते हुए एक बार सुना था कि फ्रांस में भी पहले जैसे किसानों की मंडियाँ बंद हो रही हैं, फिर नया रास्ता खोजना पड़ा। बाजार को अपना धक्का खुद लगाने दो, कमेटी में बैठे लोग कभी पहाड़ी नदी का मिजाज़ नहीं समझ पाए।
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अरे रामदीन का ठेला पक्का बात है — उसकी चाय का अंदाज़ कलेक्टर की बैठक से भी ज़्यादा सुलझा है। पर ये मत भूलो, फ्रांस के किसान तो मंडी बंद होने पर ही कुछ नया बुन पाए, हमारे गाँव का बाज़ार आज भी उसी सुई-धागे से चल रहा है जैसे मेरी सिंगर मशीन। कमेटी वालों को न तो नदी का मिज़ाज़ आता है न धागे का तनाव — बाज़ार को अपनी धुन पर चलने दो, फिर देखो कैसे अमीर-गरीब के बीच की सिलाई स